Monday, January 26, 2015

दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे,ध्यान सबसे बड़ी कुंजी है।






दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देनाशुरू करो। 
दअसल, तुम जिसपर ध्यान देते हो वह   चीज सक्रिय हो जाती  है। 
                                ध्यान सबसे बड़ी कुंजी है।

दुख को त्यागो। लगता है कि तुम दुख में मजा लेने वाले हो, तुम्हें कष्ट से प्रेम है। दुख से लगाव होना एक रोग है, यह विकृत प्रवृत्ति है, यह विक्षिप्तता है। यह प्राकृतिक नहीं है, यह बदसूरत है।

पर मुश्किल यह है कि सिखाया यही गया है। एक बात याद रखो कि मानवता पर रोग हावी रहा है, निरोग्य नहीं और इसका भी एक कारण है। असल में स्वस्थ व्यक्ति जिंदगी का मजा लेने में इतना व्यस्त रहता है कि वह दूसरों पर हावी होने की फिक्र ही नहीं करता।

अस्वस्थ व्यक्ति मजा ले ही नहीं सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है। जो गीत गा सकता है, जो नाच सकता है, वह नाचेगा और गाएगा, वह सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा। लेकिन जो नाच नहीं सकता, जो विकलांग है, जिसे लकवा मार गया है, वह कोने में पड़ा रहेगा और योजनाएँ बनाएगा कि दूसरों पर कैसे हावी हुआ जाए। वह कुटिल बन जाएगा। जो रचनाशील है, वह रचेगा। जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है।

जो रोगी है, अस्वस्थ है, बदसूरत है, प्रतिभाहीन है, जिसमें रचनाशीलता नहीं है, जो घटिया है, जो मूर्ख है, ऐसे सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी चालाक होते हैं। वे हावी रहने के तरीके और जरिए खोज ही निकालते हैं। वे राजनेता बन जाते हैं। वे पुरोहित बन जाते हैं। और चूँकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरो को भी नहीं करने दे सकते। इसलिए वे हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं।

जरा इसके पीछे का कारण देखो। अगर वह खुद जिंदगी का मजा नहीं ले सकता तो वह कम से कम तुम्हारे मजे में जहर तो घोल ही सकता है। इसीलिए सभी तरह के विकलांग एक जगह जमा होकर अपनी बुद्धि लगाते हैं ताकि जोरदार नैतिकता का ढाँचा खड़ा कर सकें और फिर उसके आधार पर हर चीज की भर्त्सना कर सकें। बस कुछ न कुछ नकारात्मक खोज निकालना है, वह तुम्हें मिल ही जाएगा, क्योंकि वह तो समस्त सकारात्मकता के अंग के रूप में होता ही है।

जब तुम प्रेम करते हो, तो नफरत भी कर सकते हो। जो व्यक्ति नपुंसक है और प्रेम नहीं कर सकता, वह हमेशा नकारात्मक पर ही जोर देगा। वह हमेशा नकारात्मक को ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करेगा। वह हमेशा तुमसे कहेगा- अगर तुम प्रेम में पड़े तो दुख उठाओगे। तुम जाल में फँस जाओगे, तुम्हें तकलीफें भोगनी होंगी। और, स्वाभाविक रूप से जब भी घृणा के क्षण आएँगे और तुम दुख का सामना करोगे तो तुम्हें वह व्यक्ति याद आएगा कि वह सही कहता था।

फिर, घृणा के क्षण तो आने ही हैं। फिर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य रोगों के प्रति ज्यादा सचेत होता है न कि स्वास्थ्य के प्रति। जब स्वस्थ होते हो तो तुम अपने शरीर के बारे में भूल जाते हो। लेकिन, जैसे ही सिर दर्द होता है या और कोई दर्द, या फिर पेट का दर्द तो देह को नहीं भूल पाते। देह होती है तब, प्रमुखता से होती है, बड़े जोर से होती है, वह तुम्हारा दरवाजा खटखटाती है। वह तुम्हारा ध्यान खींचती है।

जब तुम प्रेम में होते हो और खुश होते हो तो भूल जाते हो। लेकिन, जब संघर्ष, नफरत और गुस्सा होता है तो तुम उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगते हो। ऊपर से वे विकलांग लोग, वे नैतिकतावादी, वे पुरोहित, वे राजनेता, वे मिल कर चिल्लाते हैं एक स्वर से कि देखो, हमने तुमसे पहले ही कहा था, और तुमने हमारी नहीं सुनी। प्रेम को त्यागो। प्रेम दुख बनाता है। इसे त्यागो, उसे त्यागो, जीवन को त्यागो। इन बातों को अगर बार-बार दोहराया जाता रहता है तो उनका असर होने लगता है। लोग उनके सम्मोहन में फँस जाते हैं।

तुम कहते हो कि तुम उपवास करते रहे हो, तुमने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया है। उपवास का भला बुद्धत्व से क्या ताल्लुक हो सकता है? ब्रह्मचर्य का बुद्धत्व से कोई संबंध नहीं हो सकता? बेतुकी बात है। जो भी तुम करते हो जैसे कि तुम कहते हो कि मैं बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए रात-रात भर जागता रहता हूँ। दिन में बुद्धत्व प्राप्त करने की कोशिश क्यों नहीं करते? रात भर जागने की क्या जरूरत है? ये कुदरत के विरोध में तुम कयों खड़े हुए हो?

बुद्धत्व प्रकृति के खिलाफ नहीं होता। वह प्रकृति की परितृप्ति है। वह तो प्रकृति की चरम अभिव्यक्ति है। वह तो जितना संभव हो सकता है, उतनी प्रकृति है। प्रकृति के खिलाफ होने पर नहीं, बल्कि साथ होने पर ही तुम बुद्धत्व तक पहुँचते हो। वह बहाव के खिलाफ तैरने से नहीं, बल्कि उसके साथ बहने से मिलता है। नदी की यात्रा तो पहले से ही समुद्र की तरफ है। तुम्हें उसके खिलाफ तैरना शुरू करने की कोई जरूरत नहीं, जबकि तुम करते यही रहे हो।

अब तुम पूछोगे कि तो मुझे क्या करना चाहिए? मैं कहूँगा कि दुख के प्रति अपनी आसक्ति त्याग दो। तुम बुद्धत्व की खोज नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम तो दुख की खोज में लगे हुए हो। बुद्धत्व तो सिर्फ एक बहाना है।

जीवन से प्रेम करो, और अधिक खुश रहो। जब तुम एकदम प्रसन्न होते हो, संभावना तभी होती है, वरना नहीं। कारण यह है कि दुख तुम्हें बंद कर देता है, सुख तुम्हें खोलता है। क्या तुमने यही बात अपने जीवन में नहीं देखी? जब भी तुम दुखी होते हो, बंद हो जाते हो, एक कठोर आवरण तुम्हें घेर लेता है। तुम खुद की सुरक्षा करने लगते हो, तुम एक कवच-सा ओढ़ लेते हो। वजह यह है कि तुम जानते हो कि तुम्हें पहले से काफी तकलीफ है और अब तुम और चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते। दुखी लोग हमेशा कठोर हो जाते हैं। उनकी नरमी खत्म हो जाती है, वे चट्टानों जैसे हो जाते हैं।

एक प्रसन्न व्यक्ति तो एक फूल की तरह है। उसे ऐसा वरदान मिला हुआ है कि वह सारी दुनिया को आशीर्वाद दे सकता है। वह ऐसे वरदान से संपन्न है कि खुलने की जुर्रत कर सकता है। उसके लिए खुलने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी कुछ कितना अच्छा है, कितना मित्रतापूर्ण है। पूरी प्रकृति उसकी मित्र है। वह क्यों डरने लगा? वह खुल सकता है। वह इस अस्तित्व का आतिथेय बन सकता है। वही होता है वह क्षण जब दिव्यता तुममें प्रवेश करती है। केवल उसी क्षण में प्रकाश तुममें प्रवेश करता है, और तुम बुद्धत्व प्राप्त करते हो।

साभार: दि रिवोल्यूशन पुस्तक से
सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

६६ व्या प्रजासत्ताक दिनाच्या हार्दिक शुभेछ्या !!

६६ व्या प्रजासत्ताक दिना च्या हार्दिक शुभेछ्या !!




भारतमातेच्या चरणी प्रत्येकाचे फुल व्हावे 

 सगळ्या श्वासात भिनावा दरवळ   *****

 वंदे मातरम् !..

*** प्रजासत्ताक चिरायू होवो !*****


               २६ जानेवारी! भारताचा प्रजासत्ताक दिन; हे बरेच लोक जाणतात.
 पण १५ ऑगस्ट आणि २६ जानेवारी,
 या दिवसाचे महात्म्य टाळून 'हू केअर्स' असा पवित्र घेणा-यांची संख्याही मोठी आहे.
 स्वातंत्र्य दिन आणि प्रजासत्ताक दिन यातील फरकाकडे दुर्लक्ष करणारेही कमी नाहीत. जाण असून माहित नसल्याचे सोंग वठवून स्वत:स आधुनिक ठरवणा-या थिल्लर लोकांची संख्या आता भूछत्रासारखी वाढत आहे. काहीना २६ जानेवारी १९५० रोजी भारतात प्रजातंत्र सुरु झाले, इतकीच माहिती असते. फार कमी लोक या दिवसाची पाळेमुळे किती खोलवर रुतली आहेत ते जाणतात. आपली रास्त ओळख जाणण्यात रस असलेल्यांसाठी हा छोटा लेख! २६ जानेवारी १९५० रोजी ख-या अर्थाने 'आपल्या देशात आपले राज्य' अशी परिस्थिती निर्माण झाली, हे निर्विवाद! ही शुभ सुरुवात करण्यास याच दिवसावर पसंतीची मोहोर, अत्यंत विचारपूर्वक मारण्यात आली आहे. स्कॉटलंड, आयर्लंड प्रमाणे 'डॉमिनिअन विदिन द ब्रिटीश एम्पायर' हे ध्येय ठेऊन १९१६ साली ऑल इंडिया होमरूल ही मातबर संस्था स्थापन झाली. या संस्थेच्या कार्यात महमदअली जिन्नाह, लोकमान्य टिळक, अॅनी बेझंट, सर सुब्रह्मण्यम अय्यर, वगैरेंचा सहभाग होता.

 त्यांनी ब्रिटीशांच्या छत्राखाली प्रत्येक राज्यात स्वायत्त सरकार निर्माण करण्याची भलावण केली. पण पुढे सरकारने हिंदू-मुस्लीम प्रजेत फूट पडण्यावर भर दिला. जालियानवाला बागेतील बेछूट हत्याकांड, लोकमान्य टिळकांवर अन्याय, अॅनी बेझंटची अटक वगैरेमुळे भारतीय जनतेत असंतोष वाढला. शिवाय विश्वयुद्धामुळे परिस्थितीत वेगाने बदलत होती. म्हणून दृष्ट्या पुढा-यांना अरत्र न परत्रस्वराज्य नको वाटले. पूर्ण स्वराज्याच्या विचाराचे बीज १९२० साली अंकुरु लागले. आपल्या देशात आपले सार्वभौमत्व असले पाहिजे, हा विचार देशातील धुरीण देशभर पसरवत होते. चर्चा विचारणा होत होत्या. कार्य कसे संपन्न करावे, या विषयी मतभेद असले तरी आपल्या देशात आपले सार्वभौमत्व असलेच पाहिजे, हा आग्रह यच्चयावत देशभक्तात जोर धरू लागला. त्या काळी स्वातंत्र्याच्या चळवळीच्या संदर्भात लाहोर आणि कलकत्ता या स्थानी निर्णय घेतले जात. ३१ डिसेंबर १९२९ रोजी पंडित जवाहरलाल नेहरूंनी नॅशनल इंडियन काँग्रेसच्या सौजन्याने भारत स्वतंत्र असल्यागत लाहोर शहरी रावी नदीच्या तटावर तिरंगा फडकवून पूर्ण स्वराज्याची मागणी सूचित केली. या ध्वजावर अशोकचक्राच्या जागी चरखा होता. महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, पंडित नेहरू, वगैरेंनी पूर्ण स्वराज्याची मागणी करणारा मुद्देसूद विचार शब्दबद्ध केला. बुद्धीप्रामण्यवादी साक्षरांशी चर्चा करून 'डिक्लरेशन ऑफ ईंडीपेंडन्स ऑफ द इंडिया' चा मसूदा तयार झाला. यात पूर्ण स्वराज्यात ठीक काय अभिप्रेत आहे, ते स्पष्ट केले होते. १० वर्षांच्या वैचारिक मंथनाचे हे नवनीत! २६ जानेवारी १९३० रोजी नॅशनल इंडियन काँग्रेसने तो ठराव बहुमताने मंजूर केला. अपार आंदोलनांच्या परिणामी १५ ओगस्ट रोजी देश स्वतंत्र झाला. पण देशाची आचारसंहिता तयार झाली नव्हती. त्यासाठी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांच्या नेतृत्वाखाली काम चालू होते. १९४९ सालच्या २६ नोव्हेंबर रोजी बाबासाहेबांनी स्वतंत्र भारताची घटना राष्ट्रपतींच्या हवाली केली. वास्तविक ग्रीन व्हिले ऑस्टिन यांनी द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन कॉरनर स्टोन ऑफ नेशन या लेखात घटनेच्या कार्यात सहभागी असलेल्या २१ सदस्यांची नावे विषद केली आहेत. आपली मजल सरदारपटेल, नेहरू, आचार्य कृपलानी, मौलाना आझाद, गोविंद वल्लभ पंत, आणि डॉ. राजेंद्र प्रसाद या सात महानुभावापर्यंत पोहोचते. पण भारताची घटना तयार करण्यात रक्ताचे केले, असे उरलेले १४ अलक्षित राहतात. एम.ए.अय्यंगार, दिवान बहादूर अल्लादी क्रिष्णस्वामी अय्यर, दिवान गोपाल स्वामी अय्यंगार, श्रीमती.जी.दुर्गाबाई . टी.टी.कृष्णमाचारी, (मद्रास प्रतिनिधी) जयरामदास दोलतराम (पंजाब) शंकरराव देव (दलितांचे मुंबई प्रतिनिधित्व) कन्हैयालाल मुनशी, (मुंबई. विख्यात गुजराती लेखक. पुढे मंत्री.) जी.एस.मुखर्जी (बंगाल. पुढे राज्यपाल), बेनेगल नरसिंह राऊ आणि माधव राऊ, (ओरिसा) सय्यद मोहम्मद अताउल्ला (आसाम) सत्यनारायण सिंह (बिहार) बी.पट्टाभी. सितारामैय्या, (मद्रास रुरल प्रतिनिधी. पुढे राज्यपाल मध्य प्रदेश. ) या १४ मधील काहीचे नाही फोटो उपलब्ध की सविस्तर माहिती! डॉ. आंबेडकरांनी घटना राष्ट्रपतींना सुपूर्द केली, तेव्हा डॉ. राजेंद्रप्रसाद यांनी बेनेगल नरसिंह राऊ यांच्या कार्याचा गौरव करून डॉ. आंबेडकरांच्या तोलाचे काम केले आहे, असे आवर्जून सांगितले होते. घटनेचे लेखन करणा-या आसाम प्रतिनिधी कुलधर चालिहा यांच्या अजोड ड्राफ्टिंगचा सन्मान केला होता. दुर्दैवाने
या १४ महानुभावातील काहींची स्थिती आज नाही चिरा नाही पणती, या पठडीत आहे. वास्तविक वास्तविक घटना तयार होताच प्रजासत्ताक राष्ट्राची ९ डिसेंबर रोजी घोषणा करण्याचा प्रस्ताव आला होता. नेहरू सरकारला ते रुचले नाही. त्यांना पूर्ण स्वराज्याचा ठराव मंजूर झाला त्या ऐतिहासिक घटनेचे महत्व जोपासणे हवेसे वाटले. म्हणून २६ जानेवारीस प्रजासत्ताक राज्याची अधिकृत घोषणा करण्याचा निर्णय घेण्यात आला. पाकिस्तानची घटना १९५६ मध्ये तयार झाली. १९४० सालच्या २३ मार्च रोजी 'मिनार ए पाक' चा विचार जाहीर करण्यात आला होता. म्हणून आपले अनुकरण करून त्यांनी २३ मार्च तारखेस महत्व दिले. भारतीय पूर्ण स्वराज्याचा तसेच मिनार ए पाकचा विचार लाहोरमध्येच जाहीर झाला, हा योगायोग! वृक्षाची वाढ व्हावी या साठी रोपाचे तुरे छाटतात, मुळे नव्हे. मुळे छाटल्याने रोपाची वाढ खुंटते. ते वृक्षरूप धारण करण्याऐवजी बॉन्साय बनते. मानवाचेही तसे आहे. इतिहास देशाची मुळे ठरतो. मॉडर्न बनण्याची हौस अतीताची मुळे छाटून भागवण्याचा उथळपणा केला तर व्यक्तिमत्व चहूअंगाने विकसित होत नाही. गगनाला गवसणी घालायची महत्वाकांक्षा बाळगायची नि 'मेरा भारत महान' ख-या अर्थाने सिद्ध करायचे असेल तर इतिहास जाणला आणि जतन केला पाहिजे. ते घडत नसल्याने ही घोषणा हास्यास्पद ठरत आहे. प्रगतीपथावर असलेल्या कोणत्याही देशात अशी होर्डिंग नाहीत. इतिहासाची मुळे छाटल्याने देश बॉन्साय बनत आहे, हा विचार व्हायला हवा. उज्ज्वल भविष्यासाठी इतिहासाची जाणीव जागती ठेवणे आवश्यक! म्हणून २६ जानेवारी हा केवळ रजेचा दिवस न ठरवता या दिवसाचे महात्म्य आठवून चिंतन व्हावे. स्वराज्याच्या प्राप्तीसाठी ज्यांनी सर्वस्व अर्पण केले, त्या विख्यात तसेच प्रसिद्धीच्या झोतात नसलेल्या अनाम वीरांचे स्मरण केले पाहिजे. स्वार्थी राजकारणावर कुरघोडी करण्याची मनीषा बाळगली पाहिजे. कै. साने गुरुजींची       .   
.                                  '
बलसागर भारत होवो, विश्वात शोभूनी राहो' ही इच्छा जोजवत त्यासाठी प्रयत्न करण्यास कंबर कसण्याचा जीवाच्या   .  .                                      आकांताने प्रयत्न केला पाहिजे. अशक्यप्राय करणीच्या संदर्भात मला तुकोबा आठवतात - निश्चयाचे बळ पटवणारे! केल्याने होत आहे रे... म्हणत सुषुप्त समाजास जागे करून कार्यरत करणारे समर्थ आठवतात. आणि बहुभाषिक भारतीय या नात्याने विविध भाषातील अशी वचने आठवतात. त्यात अग्रभागी असतो एक शेर - कौन कहता है आकाशमे सुराख नही होता? तबियतसे एक पत्थर तो उछालो यारो! सुराख म्हणजे भोक! कवी म्हणतो - पूर्ण शक्तीनिशी मनापासून उडवलेला फत्तर आकाशास भोक पडू शकतो. प्रयत्नांचे अनेक फत्तर उसळले तर नक्की आकाशाची चाळण होईल. आजच्या विपरीत परिस्थितीवर मात होईल. आजच्या शुभदिनी पूर्वसुरींचे स्मरण करून परिस्थिती बदलण्याचा वसा घेतला तर 'जितेगा भारत' हे दिवास्वप्न अवश्य सिद्ध होईल. ख-या अर्थाने भारत महान ठरेल आणि ज्या पूर्वसूरींनी अपर त्याग करून आपल्याला स्वराज्याचा नजराणा दिला, त्यांना मन:पूर्वक श्रद्धांजली अर्पण केल्याचे सुख आपण मिळवू शकू. तुम्हाला नाही असे वाटत?
 तर मग चला मस्तक उन्नत करून मन:पूर्वक म्हणू या जय हिंद.
हां  लेख मला अतिशय आवडला ... म्हणून आपण ही वाचावा म्हणून आपणा साठी ......... लेखक माहीत नाही . संग्रहित आहे.
अनामिक  लेखक यांना त्रिवार सलाम ...........
जय हिंद ......... वंदे मातरम ....... भारत माता की जय ..............
राधे __/|\__कृष्ण